कपास के रोग (Cotton Diseases): लक्षण, कारण और प्रभावी रोग प्रबंधन

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कपास के रोग और प्रबंधन | Cotton Diseases Guide

कपास की खेती भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, कपास के रोग (cotton diseases) किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। भारत में कपास के रोगों से होने वाला नुकसान 10% से 15% तक होता है, जो गंभीर प्रकोप में 50% या उससे अधिक हो सकता है। इस लेख में हम कपास की फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख रोगों, उनके लक्षणों और रोग प्रबंधन (disease management) के बारे में विस्तार से जानेंगे।

कपास के प्रमुख रोग

1. उकठा रोग या विल्ट (Fusarium Wilt)

उकठा रोग कपास की फसल के लिए सबसे विनाशकारी रोगों में से एक है।

रोग का कारण: यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम f.sp. vasinfectum नामक फफूंद के कारण होता है। यह मिट्टी में वर्षों तक जीवित रह सकता है और जड़ों के माध्यम से पौधे में प्रवेश करता है।

लक्षण:

  • बीजपत्रों (cotyledons) का पीला पड़ना और भूरा होना
  • पत्तियों की तरगलता (turgidity) का नष्ट होना
  • पत्तियों का पीला पड़ना, मुरझाना और झड़ना
  • तने की संवहनी ऊतकों (vascular tissues) में भूरापन या काला रंग
  • मुख्य जड़ (taproot) का अवरुद्ध विकास और काली धारियां
  • पौधों की वृद्धि रुक जाना

अनुकूल परिस्थितियां:

  • उच्च तापमान (28-32°C)
  • गर्म और नम मिट्टी
  • पिछली फसलों से संक्रमित मिट्टी
  • नेमाटोड के कारण जड़ों में घाव

रोग प्रबंधन (Disease Management):

सांस्कृतिक उपाय:

  • रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें जैसे वरलक्ष्मी, विजय प्रताप
  • फसल चक्र अपनाएं – 3-4 साल का अंतराल रखें
  • गहरी जुताई करें ग्रीष्म ऋतु में
  • संक्रमित पौधों को उखाड़कर जला दें
  • जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें

बीज उपचार:

  • बीजों को कार्बोक्सिन या कार्बेंडाजिम @ 2 ग्राम/किलो से उपचारित करें
  • ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 4 ग्राम/किलो बीज की दर से उपयोग करें

पोषण प्रबंधन:

  • पोटाश की बढ़ी हुई मात्रा दें
  • नाइट्रोजन और फास्फोरस का संतुलित उपयोग करें
  • 4 टन/एकड़ गोबर की खाद या 60 किलो/एकड़ नीम की खली डालें

रासायनिक नियंत्रण:

  • संक्रमित स्थान पर कार्बेंडाजिम 1 ग्राम/लीटर से मिट्टी का उपचार करें

2. जीवाणु झुलसा या बैक्टीरियल ब्लाइट (Bacterial Blight)

जीवाणु झुलसा, जिसे एंगुलर लीफ स्पॉट के नाम से भी जाना जाता है, एक गंभीर जीवाणु रोग है।

रोग का कारण: यह रोग Xanthomonas citri pv. malvacearum नामक जीवाणु के कारण होता है। भारत में Race 18 सबसे अधिक विषाणुजनक है।

लक्षण:

  • पत्तियों पर छोटे, जल-सोखे (water-soaked) धब्बे जो कोणीय (angular) आकार के होते हैं
  • धब्बों के चारों ओर लाल या भूरे रंग की सीमा
  • पत्तियों का पीला होना और “हेलो” की तरह दिखना
  • पुराने धब्बे बड़े होकर काले हो जाते हैं
  • पत्तियों का फटा हुआ दिखना और समय से पहले गिरना
  • तने और पर्णवृंत (petioles) पर काले धब्बे (“ब्लैक आर्म” लक्षण)
  • गांठों (bolls) पर गोल, जल-सोखे धब्बे जो काले और धंसे हुए हो जाते हैं

अनुकूल परिस्थितियां:

  • उच्च आर्द्रता (85% से अधिक)
  • गर्म मौसम (दिन में 30-38°C, रात में 17-20°C)
  • तेज बारिश और हवा
  • ओवरहेड सिंचाई

रोग प्रबंधन:

बीज उपचार:

  • एसिड डीलिंटेड बीज का उपयोग करें
  • कॉपर ऑक्सीक्लोराइड से बीज उपचार करें
  • प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें

सांस्कृतिक उपाय:

  • फसल चक्र अपनाएं
  • संक्रमित पौधे के अवशेषों को नष्ट करें
  • खेत में स्वच्छता बनाए रखें
  • गीली परिस्थितियों में मशीनों का उपयोग न करें

जैविक नियंत्रण:

  • Pseudomonas fluorescens और Bacillus subtilis का उपयोग करें
  • नीम का अर्क (neem extract) का छिड़काव करें

रासायनिक नियंत्रण:

  • स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या कॉपर आधारित फफूंदनाशकों का छिड़काव करें

3. लीफ कर्ल वायरस (Cotton Leaf Curl Virus)

लीफ कर्ल वायरस कपास की फसल के लिए एक गंभीर खतरा है, विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान में।

रोग का कारण: यह रोग बेगोमोवायरस समूह के वायरस के कारण होता है, जो सफेद मक्खी (whitefly – Bemisia tabaci) द्वारा फैलता है।

लक्षण:

  • पत्तियों का ऊपर या नीचे की ओर मुड़ना (curling)
  • नसों (veins) का मोटा होना और गहरा रंग
  • पत्तियों की निचली सतह पर पत्ती जैसी उभार (enations)
  • पत्तियों पर कप के आकार की संरचनाएं बनना
  • पौधे का बौना रह जाना (stunting)
  • फूलों का बंद रहना और गिर जाना
  • उपज में भारी कमी (100% तक)

अनुकूल परिस्थितियां:

  • गर्म तापमान (25-30°C)
  • सफेद मक्खी की उच्च आबादी
  • वैकल्पिक परपोषी पौधों की उपस्थिति (टमाटर, भिंडी, तम्बाकू)
  • देर से बुवाई
  • बारिश के बाद गर्म मौसम

रोग प्रबंधन:

सांस्कृतिक उपाय:

  • रोग मुक्त और प्रमाणित बीज का उपयोग करें
  • प्रतिरोधी किस्में लगाएं जैसे X1530, X1730, LHH-144
  • समय पर बुवाई करें (अप्रैल के पहले सप्ताह)
  • संक्रमित पौधों को उखाड़ दें (roguing)
  • खरपतवार नियंत्रण रखें
  • खेत के आसपास भिंडी न उगाएं

वेक्टर नियंत्रण (सफेद मक्खी):

  • प्राकृतिक शत्रुओं (lacewings, ladybird beetles) को संरक्षित करें
  • नीम का तेल या पेट्रोलियम आधारित तेलों का छिड़काव करें
  • कीटनाशकों का चक्रीय उपयोग करें

रासायनिक नियंत्रण:

  • इमिडाक्लोप्रिड या डिनोटेफ्यूरान @ अनुशंसित मात्रा में
  • एसीटामिप्रिड 20% SC का उपयोग करें
  • थायामेथोक्सम का छिड़काव करें

महत्वपूर्ण: अत्यधिक कीटनाशक उपयोग से बचें क्योंकि इससे प्रतिरोधकता विकसित हो सकती है।

4. रूट रॉट या जड़ सड़न रोग (Root Rot)

जड़ सड़न रोग कपास की जड़ प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

रोग का कारण: यह रोग विभिन्न मिट्टी-जनित फफूंदों के कारण होता है:

  • Rhizoctonia solani
  • Fusarium spp.
  • Pythium spp.
  • Phymatotrichopsis omnivora (Texas root rot)

लक्षण:

  • पत्तियों का अचानक पीला पड़ना और मुरझाना
  • पौधे की ताकत में अचानक कमी
  • पौधे को आसानी से उखाड़ा जा सकता है
  • संपूर्ण जड़ प्रणाली का सड़ना
  • केवल मुख्य जड़ ही जीवित रहती है
  • जड़ों पर भूरे या लाल रंग के धब्बे
  • जड़ों की सतह पर फफूंद की भूरी या सफेदी सतह

अनुकूल परिस्थितियां:

  • खराब जल निकासी
  • अत्यधिक नमी
  • उच्च तापमान (28-35°C)
  • संक्रमित मिट्टी और पौधे के अवशेष
  • नेमाटोड द्वारा जड़ों में घाव

रोग प्रबंधन:

सांस्कृतिक उपाय:

  • गहरी गर्मी की जुताई करें
  • संक्रमित पौधे के अवशेषों को साफ करें और जला दें
  • उचित जल निकासी की व्यवस्था करें
  • फसल चक्र अपनाएं (धान, ज्वार जैसे एकबीजपत्री पौधे)
  • अप्रैल के पहले सप्ताह या जून के अंतिम सप्ताह में बुवाई करें

मिट्टी उपचार:

  • 4 टन/एकड़ गोबर की खाद या 60 किलो/एकड़ नीम की खली डालें
  • ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 4 ग्राम/किलो बीज से बीज उपचार करें
  • मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाएं

जैविक नियंत्रण:

  • ट्राइकोडर्मा हर्जियनम का उपयोग करें
  • स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस से मिट्टी का उपचार करें

रासायनिक नियंत्रण:

  • संक्रमित पौधों के आसपास कार्बेंडाजिम @ 1 ग्राम/लीटर से उपचार करें
  • फ्लूट्रियाफोल (Topguard Terra) का मिट्टी में उपयोग करें

अंतर-फसलीकरण:

  • ज्वार या मोठ बीन के साथ अंतर-फसलीकरण से मिट्टी का तापमान कम होता है

5. लाल पत्ती और पीलापन (Red Leaf/Chlorosis)

पत्तियों का लाल होना और पीलापन पोषक तत्वों की कमी का संकेत हो सकता है।

कारण:

  • नाइट्रोजन की कमी (पीलापन)
  • फास्फोरस की कमी (लाल/बैंगनी पत्तियां)
  • पोटेशियम की कमी (पत्तियों के किनारों का पीलापन)
  • मैग्नीशियम की कमी
  • जड़ों की क्षति से पोषक तत्वों का अवशोषण कम होना
  • मिट्टी में अत्यधिक नमी या सूखापन

लक्षण:

  • पुरानी पत्तियों का पीला पड़ना (नाइट्रोजन की कमी)
  • पत्तियों का लाल या बैंगनी रंग (फास्फोरस की कमी)
  • पत्तियों के किनारों का पीला या भूरा होना (पोटेशियम की कमी)
  • नसों के बीच पीलापन (मैग्नीशियम की कमी)
  • पौधे की वृद्धि में कमी

पोषण प्रबंधन से समाधान:

मिट्टी परीक्षण:

  • नियमित मिट्टी परीक्षण करवाएं
  • पोषक तत्वों की कमी का सही निदान करें

संतुलित उर्वरक प्रयोग:

  • नाइट्रोजन (N): 100-120 किलो/हेक्टेयर
  • फास्फोरस (P₂O₅): 50-60 किलो/हेक्टेयर
  • पोटेशियम (K₂O): 50-60 किलो/हेक्टेयर

सूक्ष्म पोषक तत्व:

  • जिंक सल्फेट @ 25 किलो/हेक्टेयर
  • फेरस सल्फेट @ 25 किलो/हेक्टेयर
  • मैग्नीशियम सल्फेट @ 15-20 किलो/हेक्टेयर

पत्तियों पर छिड़काव:

  • यूरिया @ 2% घोल का छिड़काव (नाइट्रोजन की कमी के लिए)
  • मल्टी-माइक्रोन्यूट्रिएंट का छिड़काव करें

कार्बनिक उर्वरक:

  • गोबर की खाद या कम्पोस्ट @ 10-15 टन/हेक्टेयर
  • हरी खाद (green manure) का उपयोग करें
  • वर्मीकम्पोस्ट @ 2.5 टन/हेक्टेयर

जल प्रबंधन से समाधान:

सिंचाई प्रबंधन:

  • फसल की विभिन्न अवस्थाओं में सही समय पर सिंचाई करें
  • अत्यधिक या कम सिंचाई से बचें
  • ड्रिप सिंचाई का उपयोग करें (पानी की बचत और समान वितरण)
  • नमी बनाए रखने के लिए मल्चिंग करें

जल निकासी:

  • खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था रखें
  • जलभराव से बचें क्योंकि इससे जड़ें सड़ सकती हैं
  • ऊंची क्यारियां बनाएं बारिश वाले क्षेत्रों में

सिंचाई की मात्रा:

  • बुवाई के समय: हल्की सिंचाई
  • वनस्पति वृद्धि अवस्था: 7-10 दिन के अंतराल पर
  • फूल और गांठ बनने की अवस्था: 5-7 दिन के अंतराल पर (महत्वपूर्ण अवस्था)
  • गांठ विकास की अवस्था: नियमित सिंचाई बनाए रखें

एकीकृत रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management)

सफल रोग प्रबंधन के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है:

1. रोकथाम उपाय:

  • रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें
  • प्रमाणित और स्वस्थ बीज का उपयोग करें
  • बीज उपचार अवश्य करें
  • खेत की स्वच्छता बनाए रखें
  • फसल चक्र अपनाएं

2. सांस्कृतिक प्रबंधन:

  • उचित बुवाई का समय
  • सही पौध घनत्व बनाए रखें
  • संतुलित पोषण प्रबंधन
  • समय पर सिंचाई करें
  • खरपतवार नियंत्रण

3. जैविक नियंत्रण:

  • ट्राइकोडर्मा, स्यूडोमोनास जैसे जैविक एजेंटों का उपयोग करें
  • प्राकृतिक शत्रुओं को संरक्षित करें
  • नीम आधारित उत्पादों का प्रयोग करें

4. रासायनिक नियंत्रण:

  • सही कीटनाशक और फफूंदनाशक का चयन करें
  • अनुशंसित मात्रा और समय का पालन करें
  • कीटनाशकों का चक्रीय उपयोग करें (प्रतिरोधकता से बचने के लिए)

5. निगरानी और निरीक्षण:

  • नियमित खेत का निरीक्षण करें
  • रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान करें
  • तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाएं

निष्कर्ष

कपास के रोग (cotton diseases) फसल उत्पादन में गंभीर बाधा डाल सकते हैं, लेकिन सही रोग प्रबंधन (disease management) और एकीकृत दृष्टिकोण से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग, बीज उपचार, फसल चक्र, संतुलित पोषण और जल प्रबंधन, जैविक नियंत्रण, और सही समय पर रासायनिक नियंत्रण इन सभी उपायों को मिलाकर कपास की फसल को स्वस्थ रखा जा सकता है।

किसानों को नियमित रूप से अपने खेतों का निरीक्षण करना चाहिए और रोग के शुरुआती लक्षणों की पहचान करके तुरंत उपचार करना चाहिए। याद रखें कि रोकथाम इलाज से बेहतर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)


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