गेहूं की खेती कैसे करें (How to Grow Wheat) – संपूर्ण जानकारी

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गेहूं की खेती कैसे करें (How to Grow Wheat) – संपूर्ण जानकारी

गेहूं (Wheat) भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है और देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में इसका योगदान लगभग 37 प्रतिशत है। भारत में गेहूं की खेती मुख्य रूप से रबी सीजन में की जाती है और यह उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में व्यापक स्तर पर उगाई जाती है। गेहूं में अन्य अनाजों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो इसे पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।

इस लेख में हम गेहूं की खेती (Gehu ki Kheti) से संबंधित सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिससे किसान भाई अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा प्राप्त कर सकें।

गेहूं की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु (Climate Requirements for Wheat Cultivation)

गेहूं की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। इस फसल के लिए ठंडा और शुष्क मौसम सबसे उपयुक्त माना जाता है।

तापमान की आवश्यकता

  • बुवाई के समय: 20 से 25 डिग्री सेल्सियस
  • वृद्धि के समय: 14 से 18 डिग्री सेल्सियस
  • पकने के समय: गर्म और शुष्क मौसम

गेहूं की फसल को प्रारंभिक चरण में ठंडी और नमीयुक्त जलवायु की आवश्यकता होती है, जबकि कटाई के समय गर्म और उज्ज्वल जलवायु की जरूरत होती है। अत्यधिक ठंड या पाला फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। गेहूं की खेती में वार्षिक वर्षा 75 से 100 सेमी तक उपयुक्त मानी जाती है।

गेहूं के लिए उपयुक्त मिट्टी (Suitable Soil for Wheat Farming)

गेहूं विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन कुछ विशेष प्रकार की मिट्टी इसके लिए अधिक उपयुक्त होती है।

मिट्टी की विशेषताएं

  • सर्वोत्तम मिट्टी: दोमट और चिकनी दोमट मिट्टी
  • pH स्तर: 6.0 से 7.5 के बीच
  • जल निकासी: अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी
  • जैविक पदार्थ: उचित मात्रा में जैविक पदार्थ युक्त

गेहूं की खेती के लिए भारी और जलभराव वाली मिट्टी उपयुक्त नहीं होती है। मिट्टी भुरभुरी और अच्छी तरह से तैयार होनी चाहिए ताकि बीजों का अंकुरण समान रूप से हो सके।

खेत की तैयारी (Land Preparation for Wheat)

गेहूं की अच्छी उपज के लिए खेत की उचित तैयारी बेहद जरूरी है।

जुताई की प्रक्रिया

  1. पहली जुताई: मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें
  2. दूसरी और तीसरी जुताई: डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 बार जुताई करें
  3. समतलीकरण: खेत को समतल करने के लिए पाटा (Leveler) का उपयोग करें
  4. मिट्टी की तैयारी: मिट्टी को भुरभुरा और समतल बनाएं

धान की फसल के बाद गेहूं की बुवाई करते समय, खेत में पड़लिंग के कारण मिट्टी कठोर हो जाती है। इसलिए रोटावेटर से जुताई करना अधिक उपयुक्त होता है, जो एक ही बार में खेत को पूरी तरह तैयार कर देता है।

गोबर की खाद का प्रयोग

खेत की तैयारी के समय 5-6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करें। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और फसल की वृद्धि बेहतर होती है।

गेहूं की उन्नत किस्में (Improved Wheat Varieties)

किस्म का चुनाव गेहूं की खेती में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए कई उन्नत किस्में विकसित की हैं।

समय से बुवाई के लिए किस्में (Timely Sown Varieties)

  • DBW 303: उच्च उपज देने वाली और रोग प्रतिरोधी
  • HD 2967: लोकप्रिय और अधिक उत्पादन देने वाली
  • HD 3086: सिंचित क्षेत्रों के लिए उत्तम
  • WH 1270: पंजाब और हरियाणा के लिए उपयुक्त
  • PBW 723: उत्तर भारत के लिए अनुशंसित

देर से बुवाई के लिए किस्में (Late Sown Varieties)

  • DBW 173: देरी से बुवाई के लिए सर्वोत्तम
  • DBW 71: कम सिंचाई में भी अच्छी उपज
  • PBW 771: रोग प्रतिरोधी क्षमता उत्कृष्ट
  • HD 3298: अत्यधिक देरी से बुवाई के लिए विशेष

सीमित सिंचाई के लिए किस्में

  • WH 1142: 2-3 सिंचाई में भी अच्छा उत्पादन
  • DBW 90: सूखा सहनशील किस्म

किसान भाइयों को हमेशा प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करना चाहिए और अपने क्षेत्र के कृषि विभाग से सलाह लेकर किस्म का चुनाव करना चाहिए।

बुवाई का सही समय (Ideal Sowing Time)

गेहूं की बुवाई का समय उपज को सीधे प्रभावित करता है।

समय से बुवाई

  • सर्वोत्तम समय: 1 नवंबर से 20 नवंबर
  • क्षेत्र विशेष: उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में 1-15 नवंबर
  • देर से बुवाई: 20 नवंबर के बाद उपज में कमी शुरू हो जाती है

महत्वपूर्ण: प्रत्येक सप्ताह देरी होने पर उपज में 3-5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की कमी आ सकती है। दिसंबर में बुवाई करने पर उपज में 3-4 क्विंटल और जनवरी में बुवाई करने पर 4-5 क्विंटल प्रति सप्ताह की दर से कमी होती है।

बुवाई की विधियां

  1. सीड ड्रिल विधि: सबसे उत्तम और किफायती
  2. देसी हल विधि: पारंपरिक विधि
  3. जीरो टिलेज विधि: संसाधन संरक्षण के लिए उत्तम

सीड ड्रिल से बुवाई करने पर बीज और उर्वरक दोनों की बचत होती है और फसल एकसमान होती है।

बीज की मात्रा और बुवाई की दूरी

बीज दर (Seed Rate)

  • समय से बुवाई: 100-120 किलो प्रति हेक्टेयर
  • देर से बुवाई: 125-150 किलो प्रति हेक्टेयर
  • सीड ड्रिल से: 100 किलो प्रति हेक्टेयर

बुवाई की दूरी

  • पंक्ति से पंक्ति: 22.5 सेमी (सिंचित क्षेत्र में)
  • पौधे से पौधे: 8-10 सेमी
  • असिंचित क्षेत्र: पंक्ति की दूरी 25-30 सेमी
  • बुवाई की गहराई: 4-5 सेमी

बीजोपचार (Seed Treatment)

बीजोपचार करने से कई प्रकार के मिट्टी और बीज जनित रोगों से बचाव होता है।

बीजोपचार की विधि

  1. कार्बेंडाजिम: 2-2.5 ग्राम प्रति किलो बीज
  2. थाइरम: 2 ग्राम प्रति किलो बीज
  3. विटावैक्स: प्रमाणित मात्रा में उपयोग करें

विधि: सबसे पहले बीज में फफूंदनाशक दवा मिलाएं, फिर बीज को हल्का गीला करें ताकि दवाई पूरे बीज पर लग जाए। बीजोपचार के बाद 24 घंटे के भीतर बुवाई कर दें।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)

गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण अत्यंत आवश्यक है।

उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा

सिंचित क्षेत्र के लिए (प्रति हेक्टेयर):

  • नाइट्रोजन (N): 120-150 किलो
  • फास्फोरस (P2O5): 60 किलो
  • पोटाश (K2O): 40 किलो
  • जिंक सल्फेट: 25 किलो (जिंक की कमी वाली मिट्टी में)

उर्वरक देने की विधि

  1. बुवाई के समय: DAP 130 किलो + म्यूरेट ऑफ पोटाश 65 किलो + आधा यूरिया
  2. पहली सिंचाई पर (21 दिन): 40-50 किलो यूरिया प्रति एकड़
  3. दूसरी सिंचाई पर: शेष यूरिया 25-30 किलो प्रति एकड़

सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)

  • जिंक की कमी: जिंक सल्फेट का छिड़काव या मिट्टी में मिलाएं
  • सल्फर की कमी: सल्फर युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें

उर्वरकों का प्रयोग हमेशा मिट्टी परीक्षण के आधार पर करना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)

गेहूं की फसल को समय पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। अधिक उपज के लिए 5-6 सिंचाइयां जरूरी हैं।

महत्वपूर्ण सिंचाई अवस्थाएं

  1. पहली सिंचाई (CRI Stage): बुवाई के 21 दिन बाद – यह सबसे महत्वपूर्ण है
  2. दूसरी सिंचाई: कल्ले निकलते समय (40-45 दिन)
  3. तीसरी सिंचाई: गांठें बनते समय (60-65 दिन)
  4. चौथी सिंचाई: फूल आने से पहले (70-75 दिन)
  5. पांचवी सिंचाई: दूधिया अवस्था (85-90 दिन)
  6. छठी सिंचाई: दाना पकते समय (100-105 दिन)

सिंचाई की आधुनिक तकनीकें

  • फव्वारा सिंचाई (Sprinkler Irrigation): जल की 30-40% बचत
  • ड्रिप सिंचाई: कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
  • सरकारी सब्सिडी: इन तकनीकों पर अनुदान उपलब्ध है

ध्यान दें: अधिक पानी देने से फसल में बीमारियां लग सकती हैं, इसलिए आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करें।

खरपतवार नियंत्रण (Weed Management)

गेहूं की फसल में विभिन्न प्रकार के खरपतवार लगते हैं जैसे बथुआ, प्याजी, कृष्णनील, गेहूंसा और जंगली जई आदि।

यांत्रिक नियंत्रण

  • निराई-गुड़ाई: बुवाई के 25-30 दिन बाद पहली निराई
  • व्हील हो या हैंड हो: पंक्तियों के बीच निराई के लिए उपयोगी

रासायनिक नियंत्रण

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार (बथुआ, कासनी) के लिए:

  • 2,4-D: 500-800 ग्राम प्रति हेक्टेयर, बुवाई के 25-30 दिन बाद छिड़काव

सकरी पत्ती वाले खरपतवार (गेहूंसा, जंगली जई) के लिए:

  • सल्फोसल्फ्यूरॉन: 25 ग्राम प्रति हेक्टेयर
  • क्लोडिनाफॉप: 60 ग्राम प्रति हेक्टेयर

महत्वपूर्ण सुझाव: खरपतवारनाशी का छिड़काव सुबह या शाम के समय हवा रहित मौसम में करें और 500-600 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर का उपयोग करें।

प्रमुख रोग एवं कीट नियंत्रण (Disease and Pest Management)

प्रमुख रोग

1. करनाल बंट या खुला कंडवा (Loose Smut)

  • लक्षण: बाली में काले दाने बनना
  • नियंत्रण: बीजोपचार और प्रमाणित बीज का प्रयोग

2. रतुआ या गेरुई (Rust)

  • पीला रतुआ, भूरा रतुआ और काला रतुआ
  • नियंत्रण: प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल का छिड़काव

3. झुलसा रोग (Blight)

  • नियंत्रण: मैंकोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव

प्रमुख कीट

1. माहू या एफिड (Aphids)

  • छोटे हरे या काले कीट जो पत्तियों का रस चूसते हैं
  • नियंत्रण: इमिडाक्लोप्रिड या थायोमेथोक्साम का छिड़काव

2. दीमक (Termites)

  • जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं
  • नियंत्रण: क्लोरपायरीफॉस का मिट्टी में उपयोग

एकीकृत कीट प्रबंधन: रासायनिक नियंत्रण के साथ-साथ जैविक विधियों का भी उपयोग करें।

कटाई और गहाई (Harvesting and Threshing)

कटाई का सही समय

  • फसल 120-130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है
  • दाने सख्त हो जाएं और नमी 20-25% रह जाए
  • पत्तियां पीली पड़ने लगें

कटाई की विधि

  1. हाथ से कटाई: पारंपरिक विधि, हंसिए का उपयोग
  2. रीपर से: तेज और किफायती
  3. कंबाइन हार्वेस्टर: बड़े क्षेत्र के लिए उत्तम

भंडारण (Storage)

  • दानों में नमी 12% से कम होनी चाहिए
  • साफ और सूखी जगह पर भंडारण करें
  • कीटों से बचाव के लिए नीम की पत्तियां या एल्युमिनियम फॉस्फाइड का उपयोग करें

उपज और आर्थिक लाभ (Yield and Economic Benefits)

अपेक्षित उपज

  • समय से बुवाई (सिंचित): 55-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • देर से बुवाई (सिंचित): 40-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • असिंचित क्षेत्र: 25-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • उन्नत तकनीक से: 70-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक संभव

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

2023-24 के लिए गेहूं का MSP ₹2,125 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष से ₹110 अधिक है।

आर्थिक विश्लेषण (प्रति हेक्टेयर)

  • कुल लागत: ₹35,000-40,000
  • उपज: 60 क्विंटल (औसत)
  • कुल आय: ₹1,27,500 (MSP के आधार पर)
  • शुद्ध लाभ: ₹85,000-90,000

आधुनिक तकनीकें (Modern Technologies)

जीरो टिलेज तकनीक (Zero Tillage)

  • खेत की जुताई के बिना सीधे बुवाई
  • समय, पैसा और ईंधन की बचत
  • मिट्टी की संरचना बनी रहती है

लेजर लैंड लेवलिंग (Laser Land Levelling)

  • खेत को समतल करने की आधुनिक तकनीक
  • पानी की 20-25% बचत
  • उपज में 10-15% वृद्धि

हैप्पी सीडर (Happy Seeder)

  • पराली प्रबंधन का उत्तम समाधान
  • धान के ठूंठ में सीधे गेहूं की बुवाई
  • पर्यावरण के अनुकूल तकनीक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: गेहूं की बुवाई का सबसे अच्छा समय क्या है?

उत्तर: गेहूं की बुवाई का सबसे उत्तम समय 1 से 20 नवंबर के बीच है। इस समय बुवाई करने पर अधिकतम उपज मिलती है। 20 नवंबर के बाद प्रत्येक सप्ताह की देरी से उपज में 3-5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की कमी हो सकती है।

प्रश्न 2: गेहूं की फसल में कितनी सिंचाई की आवश्यकता होती है?

उत्तर: गेहूं की फसल में अच्छी उपज के लिए 5-6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई CRI अवस्था (बुवाई के 21 दिन बाद), कल्ले निकलते समय, गांठें बनते समय और दाना भरते समय करनी चाहिए।

प्रश्न 3: गेहूं की खेती में प्रति हेक्टेयर कितना खाद डालना चाहिए?

उत्तर: सिंचित क्षेत्र में गेहूं की खेती के लिए 120-150 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फास्फोरस और 40 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। इसके अलावा 5-6 टन गोबर की खाद और जिंक की कमी वाली मिट्टी में 25 किलो जिंक सल्फेट का उपयोग करें।

प्रश्न 4: गेहूं की फसल में माहू (एफिड) का नियंत्रण कैसे करें?

उत्तर: माहू के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL की 0.3 मिली या थायोमेथोक्साम 25% WG की 0.3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। नीम के तेल का भी प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 5: गेहूं की खेती से प्रति हेक्टेयर कितनी उपज मिलती है?

उत्तर: सिंचित क्षेत्र में समय से बुवाई करने पर 55-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने और उन्नत किस्मों का उपयोग करने पर 70-80 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

निष्कर्ष

गेहूं की खेती (Wheat Cultivation) भारतीय कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा है और किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत है। इस लेख में बताई गई वैज्ञानिक तकनीकों और सुझावों को अपनाकर किसान भाई अपनी उपज में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। समय पर बुवाई, उचित खाद प्रबंधन, नियमित सिंचाई और कीट-रोग नियंत्रण ही सफल गेहूं की खेती की कुंजी है। आधुनिक तकनीकों जैसे जीरो टिलेज और लेजर लेवलिंग का उपयोग करके न केवल लागत कम की जा सकती है, बल्कि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। किसान भाइयों को हमेशा अपने क्षेत्र के कृषि विभाग से संपर्क करके स्थानीय सिफारिशों का पालन करना चाहिए।

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