धान की खेती की पूरी जानकारी (Paddy Farming Complete Guide)

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धान की खेती पूरी जानकारी | Paddy Farming Guide

धान (Paddy या Rice) भारत की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है और देश की लगभग आधी आबादी के लिए मुख्य भोजन है। भारत चीन के बाद विश्व में धान का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा भारत के प्रमुख धान उत्पादक राज्य हैं।

धान की खेती (Dhan ki Kheti) मुख्य रूप से खरीफ सीजन में की जाती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में रबी और जायद सीजन में भी इसकी खेती होती है। देश में लगभग 4.70 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। इस लेख में हम धान की खेती से संबंधित सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

धान की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु (Climate Requirements)

धान एक उष्णकटिबंधीय फसल है जिसके लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।

तापमान की आवश्यकता

  • अंकुरण के लिए: 20-25 डिग्री सेल्सियस
  • वृद्धि के समय: 25-35 डिग्री सेल्सियस
  • परिपक्वता के समय: 20-25 डिग्री सेल्सियस

धान की फसल को सम्पूर्ण वृद्धि काल में उच्च आर्द्रता (80-90%) की आवश्यकता होती है। वार्षिक वर्षा 100-200 सेमी इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। धान की खेती के लिए पर्याप्त धूप भी अत्यंत आवश्यक है।

उपयुक्त मिट्टी (Suitable Soil for Paddy)

धान की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में सफलतापूर्वक की जा सकती है।

मिट्टी की विशेषताएं

  • सर्वोत्तम मिट्टी: चिकनी दोमट और चिकनी मिट्टी
  • pH स्तर: 5.0 से 9.5 के बीच (आदर्श 6.0-7.0)
  • जल धारण क्षमता: उच्च जल धारण क्षमता वाली मिट्टी
  • जैविक पदार्थ: पर्याप्त जैविक पदार्थ युक्त

धान की खेती के लिए ऐसी मिट्टी उत्तम होती है जिसमें पानी रोकने की क्षमता अधिक हो। भारी चिकनी मिट्टी जिसमें 50% तक मिट्टी की मात्रा हो, धान के लिए आदर्श मानी जाती है। मिट्टी की अच्छी जल धारण क्षमता के कारण जलमग्न स्थिति बनाए रखना आसान होता है।

खेत की तैयारी (Field Preparation)

धान की खेती में खेत की उचित तैयारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जुताई की प्रक्रिया

  1. गर्मी की जुताई: मई-जून में गहरी जुताई करें
  2. पहली जुताई: मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई
  3. दूसरी और तीसरी जुताई: हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 बार जुताई
  4. पडलिंग (Puddling): खेत में पानी भरकर 2-3 बार जुताई करें
  5. समतलीकरण: लेजर लैंड लेवलर से खेत को समतल बनाएं

खेत की मेड़बंदी

धान की खेती में पानी रोकने के लिए खेत के चारों ओर 15-20 सेमी ऊंची मेड़ बनाएं। मेड़ों को मजबूत और चौड़ा बनाएं ताकि पानी का रिसाव न हो।

नर्सरी तैयारी (Nursery Preparation)

धान की खेती की शुरुआत नर्सरी से होती है, इसलिए नर्सरी की उचित तैयारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

नर्सरी क्षेत्र

  • एक हेक्टेयर खेत के लिए: 800-1000 वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र
  • नर्सरी स्थान: मुख्य खेत के पास, अच्छी जल निकासी वाला स्थान
  • मिट्टी: उपजाऊ और भुरभुरी मिट्टी

नर्सरी तैयार करने की विधि

  1. नर्सरी क्षेत्र को अच्छी तरह जोतें और समतल करें
  2. 1 मीटर चौड़ी और 10 मीटर लम्बी क्यारियां बनाएं
  3. प्रति वर्ग मीटर 10 किलो सड़ी गोबर की खाद मिलाएं
  4. 500 ग्राम DAP प्रति वर्ग मीटर की दर से मिलाएं
  5. क्यारियों के बीच 30 सेमी की नाली छोड़ें

नर्सरी में बीज की मात्रा

  • मोटे धान के लिए: 30-35 किलो प्रति हेक्टेयर
  • बारीक धान के लिए: 25-30 किलो प्रति हेक्टेयर
  • हाइब्रिड धान के लिए: 15-20 किलो प्रति हेक्टेयर

बीजोपचार (Seed Treatment)

बीजोपचार से बीज और मिट्टी जनित रोगों से बचाव होता है।

बीजोपचार की विधि

रासायनिक उपचार:

  • कार्बेंडाजिम या थाइरम: 2-2.5 ग्राम प्रति किलो बीज
  • स्ट्रेप्टोसाइक्लिन: 100 पीपीएम घोल में 12 घंटे भिगोएं

जैविक उपचार:

  • ट्राइकोडर्मा विरिडी: 10 ग्राम प्रति किलो बीज
  • स्यूडोमोनास: 10 ग्राम प्रति किलो बीज

बीज अंकुरण प्रक्रिया

  1. बीज को 24 घंटे साफ पानी में भिगोएं
  2. बीज को निकालकर गीले बोरे में लपेटें
  3. छायादार स्थान पर 36-48 घंटे रखें
  4. अंकुरण के बाद नर्सरी में बुवाई करें

धान की उन्नत किस्में (Improved Paddy Varieties)

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए कई उन्नत किस्में विकसित की हैं।

खरीफ सीजन के लिए किस्में

उत्तर भारत के लिए:

  • पूसा बासमती 1121: बासमती धान की उत्कृष्ट किस्म, 145-150 दिन
  • पूसा 44: सुगंधित चावल, उच्च उपज, 130-135 दिन
  • पूसा 1509: बासमती किस्म, 120-125 दिन
  • PR 126 (PRH 10): हाइब्रिड किस्म, पंजाब के लिए उपयुक्त

पूर्वी और दक्षिणी भारत के लिए:

  • स्वर्णा (MTU 7029): सबसे लोकप्रिय किस्म, 145-150 दिन
  • IR 64: व्यापक रूप से उगाई जाने वाली किस्म
  • BPT 5204 (सांबा मसूरी): आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में लोकप्रिय
  • नवीन: बिहार के लिए उपयुक्त, 135-140 दिन

कम अवधि की किस्में

  • पूसा सुगंध 3: 115-120 दिन, सुगंधित
  • पूसा सुगंध 5: 120-125 दिन, बासमती प्रकार
  • गोविंदभोग: पश्चिम बंगाल की लोकप्रिय किस्म

हाइब्रिड किस्में

  • DRRH 3: अधिक उपज देने वाली हाइब्रिड
  • PHB 71: पंजाब की लोकप्रिय हाइब्रिड
  • Arize 6444 Gold: निजी कंपनी की उन्नत किस्म

किसानों को अपने क्षेत्र के अनुसार किस्म का चुनाव करना चाहिए और हमेशा प्रमाणित बीज का उपयोग करना चाहिए।

बुवाई का समय और विधि (Sowing Time and Methods)

बुवाई का समय

खरीफ धान:

  • नर्सरी: मई के दूसरे सप्ताह से जून के तीसरे सप्ताह तक
  • रोपाई: जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के तीसरे सप्ताह तक

रबी धान (कुछ क्षेत्रों में):

  • नर्सरी: नवंबर-दिसंबर
  • रोपाई: दिसंबर-जनवरी

धान की बुवाई की विधियां

1. रोपाई विधि (Transplanting Method)

यह सबसे लोकप्रिय और उच्च उपज देने वाली विधि है।

प्रक्रिया:

  • 20-25 दिन पुरानी पौध की रोपाई करें
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी: 20 सेमी
  • पौधे से पौधे की दूरी: 15 सेमी
  • रोपाई की गहराई: 2-3 सेमी
  • प्रति स्थान 2-3 पौध लगाएं

2. सीधी बुवाई विधि (Direct Seeded Rice – DSR)

यह विधि श्रम और पानी की बचत करती है।

लाभ:

  • श्रम की बचत (30-35%)
  • पानी की बचत (20-25%)
  • समय की बचत
  • लागत में कमी

विधि:

  • जीरो टिलेज सीड ड्रिल या मल्टी क्रॉप प्लांटर से बुवाई
  • बीज दर: 25-30 किलो प्रति हेक्टेयर
  • पंक्ति से पंक्ति: 20 सेमी

3. SRI विधि (System of Rice Intensification)

यह विधि कम संसाधनों में अधिक उत्पादन देती है।

विशेषताएं:

  • 8-12 दिन की कम उम्र की पौध
  • अधिक दूरी: 25×25 सेमी
  • प्रति स्थान केवल 1 पौध
  • पानी की न्यूनतम आवश्यकता
  • नियमित निराई-गुड़ाई

लाभ:

  • 20-30% अधिक उपज
  • 40-50% पानी की बचत
  • कम बीज दर (5-6 किलो प्रति हेक्टेयर)

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Fertilizer Management)

धान की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण आवश्यक है।

उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा (प्रति हेक्टेयर)

सामान्य किस्मों के लिए:

  • नाइट्रोजन (N): 120 किलो
  • फास्फोरस (P2O5): 60 किलो
  • पोटाश (K2O): 40 किलो
  • जिंक सल्फेट: 25 किलो (कमी वाले क्षेत्रों में)

हाइब्रिड किस्मों के लिए:

  • नाइट्रोजन (N): 150 किलो
  • फास्फोरस (P2O5): 75 किलो
  • पोटाश (K2O): 50 किलो

उर्वरक देने का समय

  1. बेसल (रोपाई के समय): आधा नाइट्रोजन + पूरा फास्फोरस + पूरा पोटाश
  2. पहली टॉप ड्रेसिंग (20-25 दिन बाद): एक चौथाई नाइट्रोजन
  3. दूसरी टॉप ड्रेसिंग (40-45 दिन बाद): शेष एक चौथाई नाइट्रोजन

जैविक खाद

  • गोबर की खाद: 10-12 टन प्रति हेक्टेयर
  • हरी खाद: ढैंचा या सनई उगाकर मिट्टी में मिलाएं
  • कम्पोस्ट: 8-10 टन प्रति हेक्टेयर

सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)

धान एक जलमग्न फसल है जिसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है।

पानी की आवश्यकता

  • कुल पानी की आवश्यकता: 1000-1500 मिमी
  • खेत में पानी की गहराई: 5-10 सेमी

महत्वपूर्ण अवस्थाएं

  1. रोपाई के समय: 2-3 सेमी पानी
  2. कल्ले निकलने की अवस्था (20-40 दिन): 5-7 सेमी पानी
  3. गांठें बनने की अवस्था (55-65 दिन): 8-10 सेमी पानी
  4. फूल आने की अवस्था (75-85 दिन): 7-8 सेमी पानी
  5. दाना भरने की अवस्था (85-100 दिन): 5-6 सेमी पानी
  6. पकने की अवस्था: खेत से पानी निकाल दें (कटाई से 7-10 दिन पहले)

पानी बचाने की तकनीकें

AWD (Alternate Wetting and Drying):

  • खेत में हल्की दरारें आने पर ही सिंचाई करें
  • 30-40% पानी की बचत
  • उपज में कोई कमी नहीं

खरपतवार नियंत्रण (Weed Management)

धान की फसल में खरपतवार गंभीर समस्या है।

प्रमुख खरपतवार

  • सकरी पत्ती वाले: सावां, मोथा, दूब घास
  • चौड़ी पत्ती वाले: कन्हीं, बथुआ, चौलाई

नियंत्रण के उपाय

यांत्रिक नियंत्रण:

  • कोनो वीडर का उपयोग (रोपाई के 20-25 दिन बाद)
  • SRI विधि में हर 10 दिन पर निराई-गुड़ाई

रासायनिक नियंत्रण:

रोपाई विधि के लिए:

  • ब्यूटाक्लोर (Butachlor): 2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर (रोपाई के 3 दिन के भीतर)
  • प्रेटिलाक्लोर (Pretilachlor): 1 लीटर प्रति हेक्टेयर

सीधी बुवाई के लिए:

  • पेंडीमेथलिन (Pendimethalin): 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर (बुवाई के 2 दिन के भीतर)
  • बिसपायरीबैक सोडियम: 200 मिली प्रति हेक्टेयर (15-20 दिन बाद)

प्रमुख रोग एवं कीट नियंत्रण (Disease and Pest Management)

प्रमुख रोग

1. झोंका या ब्लास्ट (Blast)

  • लक्षण: पत्तियों और बालियों पर धब्बे
  • नियंत्रण: ट्राइसाइक्लाजोल 75% WP @ 600 ग्राम प्रति हेक्टेयर

2. जीवाणु पत्ती झुलसा (Bacterial Leaf Blight – BLB)

  • लक्षण: पत्तियों के किनारे पीले होना
  • नियंत्रण: स्ट्रेप्टोसाइक्लिन + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव

3. खैरा या भूरी चित्ती (Brown Spot)

  • लक्षण: पत्तियों पर भूरे धब्बे
  • नियंत्रण: मैंकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में छिड़काव

4. तना सड़न (Stem Rot/Sheath Blight)

  • लक्षण: तने के निचले भाग पर धब्बे
  • नियंत्रण: कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर

प्रमुख कीट

1. तना छेदक (Stem Borer)

  • लक्षण: डेड हार्ट और व्हाइट इयर हेड
  • नियंत्रण: कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर

2. पत्ती लपेटक (Leaf Folder)

  • लक्षण: पत्तियों का मुड़ना
  • नियंत्रण: क्लोरपायरीफॉस 2.5 मिली प्रति लीटर

3. हरा फुदका (Green Leaf Hopper – GLH)

  • लक्षण: पत्तियों का पीला पड़ना
  • नियंत्रण: इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली प्रति लीटर

4. गंधी कीट (Stink Bug)

  • लक्षण: दानों का खाली रहना
  • नियंत्रण: मैलाथियान 2 मिली प्रति लीटर

एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM)

  • फेरोमोन ट्रैप का उपयोग
  • प्रकाश प्रपंच (Light Trap) लगाएं
  • जैविक नियंत्रण: ट्राइकोग्रामा कार्ड का उपयोग
  • पक्षियों के बैठने के लिए T-आकार की खूंटियां लगाएं

कटाई और गहाई (Harvesting and Threshing)

कटाई का सही समय

  • फसल 130-150 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है
  • जब 80-85% दाने पक जाएं
  • दानों में नमी 20-25% रह जाए
  • बालियों का रंग सुनहरा पीला हो जाए

कटाई की विधि

  1. हाथ से कटाई: पारंपरिक विधि, हंसिया का उपयोग
  2. रीपर से: मध्यम क्षेत्र के लिए
  3. कंबाइन हार्वेस्टर: बड़े क्षेत्र और व्यवसायिक खेती के लिए

गहाई (Threshing)

  • पैडल थ्रेशर का उपयोग
  • कंबाइन हार्वेस्टर से एक साथ कटाई और गहाई

भंडारण (Storage)

  • धान को 12-14% नमी तक सुखाएं
  • साफ और सूखी जगह पर भंडारण करें
  • नमी से बचाव के लिए तिरपाल का उपयोग करें
  • कीटों से बचाव: एल्युमिनियम फॉस्फाइड टैबलेट का उपयोग

उपज और आर्थिक लाभ (Yield and Economics)

अपेक्षित उपज (धान)

  • सामान्य किस्में: 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • उन्नत किस्में: 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • हाइब्रिड किस्में: 70-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • SRI विधि: 70-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

चावल की प्राप्ति

  • धान से चावल की प्राप्ति: 65-70%
  • 100 किलो धान से लगभग 65-70 किलो चावल मिलता है

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

2024-25 के लिए धान का MSP:

  • सामान्य धान: ₹2,300 प्रति क्विंटल
  • ग्रेड ए धान: ₹2,320 प्रति क्विंटल

आर्थिक विश्लेषण (प्रति हेक्टेयर)

  • कुल लागत: ₹45,000-55,000
  • उपज (धान): 60 क्विंटल (औसत)
  • कुल आय: ₹1,38,000 (MSP के आधार पर)
  • शुद्ध लाभ: ₹80,000-90,000

आधुनिक तकनीकें (Modern Technologies)

1. SRI (System of Rice Intensification)

यह एक क्रांतिकारी तकनीक है जो कम संसाधनों में अधिक उत्पादन देती है।

मुख्य सिद्धांत:

  • युवा पौध की रोपाई (8-12 दिन)
  • एकल पौध रोपाई
  • वर्गाकार रोपाई (25×25 सेमी)
  • वैकल्पिक सिंचाई (AWD)
  • नियमित निराई-गुड़ाई

2. DSR (Direct Seeded Rice)

लाभ:

  • श्रम की 30-35% बचत
  • पानी की 20-25% बचत
  • मीथेन उत्सर्जन में कमी
  • समय की बचत

3. लेजर लैंड लेवलिंग

  • खेत को पूर्ण रूप से समतल बनाता है
  • पानी की 25-30% बचत
  • उपज में 10-15% वृद्धि

4. मशीनीकरण (Mechanization)

  • पैडी ट्रांसप्लांटर: रोपाई की मशीन
  • कोनो वीडर: खरपतवार नियंत्रण
  • कंबाइन हार्वेस्टर: कटाई और गहाई

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: धान की नर्सरी कब तैयार करनी चाहिए?

उत्तर: खरीफ धान के लिए नर्सरी मई के दूसरे सप्ताह से जून के तीसरे सप्ताह तक तैयार की जाती है। नर्सरी में बीज की बुवाई के 20-25 दिन बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। जून के अंत या जुलाई के पहले सप्ताह में रोपाई करना सर्वोत्तम माना जाता है।

प्रश्न 2: एक हेक्टेयर धान की खेती के लिए कितने बीज की आवश्यकता होती है?

उत्तर: रोपाई विधि में मोटे धान के लिए 30-35 किलो और बारीक धान के लिए 25-30 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। हाइब्रिड धान के लिए 15-20 किलो बीज पर्याप्त है। सीधी बुवाई (DSR) में 25-30 किलो बीज प्रति हेक्टेयर चाहिए।

प्रश्न 3: धान की फसल में तना छेदक कीट का नियंत्रण कैसे करें?

उत्तर: तना छेदक के नियंत्रण के लिए कार्टेप हाइड्रोक्लोराइड 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर या क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 150 मिली प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें। जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा कार्ड का उपयोग करें। फेरोमोन ट्रैप और प्रकाश प्रपंच भी प्रभावी हैं।

प्रश्न 4: धान की फसल में कितनी बार सिंचाई करनी चाहिए?

उत्तर: धान एक जलमग्न फसल है जिसमें खेत में लगातार 5-10 सेमी पानी बना रहना चाहिए। रोपाई से लेकर कटाई से 7-10 दिन पहले तक खेत में पानी रखना आवश्यक है। AWD तकनीक में हल्की दरारें आने पर ही सिंचाई करें, इससे 30-40% पानी की बचत होती है।

प्रश्न 5: धान की खेती से प्रति हेक्टेयर कितनी उपज मिलती है?

उत्तर: सामान्य किस्मों से 50-60 क्विंटल, उन्नत किस्मों से 60-70 क्विंटल और हाइब्रिड किस्मों से 70-90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर धान की उपज मिलती है। SRI विधि अपनाने पर 70-80 क्विंटल तक उत्पादन संभव है। उचित देखभाल और वैज्ञानिक तरीकों से उपज में वृद्धि की जा सकती है।

निष्कर्ष

धान की खेती (Paddy Farming) भारतीय कृषि की रीढ़ है और लाखों किसानों की आजीविका का साधन है। इस लेख में बताई गई वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक विधियों को अपनाकर किसान भाई अपनी उपज में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। समय पर नर्सरी तैयारी, उचित किस्म का चुनाव, संतुलित खाद प्रबंधन, नियमित सिंचाई और कीट-रोग नियंत्रण सफल धान की खेती की कुंजी हैं।

SRI और DSR जैसी आधुनिक तकनीकें न केवल संसाधनों की बचत करती हैं बल्कि उत्पादन भी बढ़ाती हैं। जल प्रबंधन के लिए AWD तकनीक अपनाना और मशीनीकरण का उपयोग करना आज के समय की आवश्यकता है। किसान भाइयों को हमेशा अपने क्षेत्र के कृषि विभाग से संपर्क करके स्थानीय सिफारिशों का पालन करना चाहिए और प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करना चाहिए।

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