हींग की खेती कैसे करें – बुवाई से उत्पादन तक सम्पूर्ण जानकारी (heeng ki kheti)

हींग की खेती कैसे करें – सम्पूर्ण जानकारी 2025 | SmartKrishi
मसाला फसल गाइड 2025

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हींग की खेती कैसे करें
Heeng Ki Kheti – बुवाई से उत्पादन तक सम्पूर्ण जानकारी

भारत में हींग की खेती की शुरुआत हो चुकी है। जानें CSIR-IHBT द्वारा प्रमाणित विधि, उपयुक्त क्षेत्र, मिट्टी, सिंचाई और इस बहुमूल्य मसाला फसल से होने वाली कमाई की पूरी जानकारी।

वानस्पतिक नाम
Ferula assa-foetida
उपयुक्त तापमान
-4°C से 40°C
फसल अवधि
5 वर्ष
बाजार मूल्य
₹35,000–₹40,000/किग्रा
वार्षिक वर्षा
300 मिमी से कम
उपयुक्त pH
7.0 – 8.5 (क्षारीय)

हींग क्या है – परिचय और महत्व

हींग (Asafoetida) एक बहुमूल्य मसाला और औषधीय पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम Ferula assa-foetida है। यह एक बारहमासी (perennial) शाकीय पौधा है जिसकी जड़ों से निकलने वाले ओलिओ-गम रेजिन (oleo-gum resin) को ही हींग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह रेजिन सूखने पर 40 से 64 प्रतिशत तक ओलिओरेजिन देता है।

भारत में हींग का उपयोग हजारों वर्षों से होता आ रहा है। चरक संहिता, महाभारत और पाणिनि के ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। खाने में तड़के से लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सा तक – हींग का स्थान भारतीय रसोई में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाचन, गैस, पेट दर्द और श्वास रोगों में भी लाभकारी मानी जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य: दुनियाभर में उत्पादित हींग का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में उपभोग होता है। इसके बावजूद भारत अब तक हींग का उत्पादन नहीं करता था और सालाना लगभग 1200 टन कच्ची हींग ईरान, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान से आयात करता था जिस पर करीब ₹600 करोड़ खर्च होते थे।

भारत में हींग की खेती का इतिहास और वर्तमान स्थिति

भारत में हींग की खेती का कोई लंबा इतिहास नहीं रहा है। हींग का पौधा (Ferula assa-foetida) मूल रूप से ईरान के रेगिस्तानों और अफगानिस्तान की पहाड़ियों का निवासी है। हालाँकि भारत में Ferula जाति के कुछ पौधे पाए जाते हैं जैसे पश्चिमी हिमालय में Ferula jaeschkeana और कश्मीर-लद्दाख में Ferula narthex, लेकिन ये प्रजातियाँ हींग का उत्पादन नहीं करतीं।

CSIR-IHBT (Institute of Himalayan Bioresource Technology), पालमपुर ने 2018 में ईरान से हींग के 6 accession बीज ICAR-NBPGR के माध्यम से भारत में मंगाए। ICAR-NBPGR ने पुष्टि की कि यह पिछले 30 वर्षों में हींग के बीज आयात करने का पहला प्रयास था। 15 अक्टूबर 2020 को CSIR-IHBT के निदेशक डॉ. संजय कुमार ने हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी के ग्राम क्वारिंग में पहला हींग का पौधा रोपा, जिससे भारत में हींग की खेती की औपचारिक शुरुआत हुई।

हाल ही में CSIR-IHBT ने पालमपुर (ऊँचाई 1300 मीटर) में हींग का पहला सफल पुष्पण और बीज स्थापन (flowering and seed setting) दर्ज किया, जो भारतीय मिट्टी में इसके domestication की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। अधिक जानकारी के लिए CSIR-IHBT की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

सरकारी पहल: हिमाचल प्रदेश सरकार ने 6 मार्च 2020 के बजट भाषण में हींग की खेती को राज्य में बढ़ावा देने की घोषणा की। 6 जून 2020 को CSIR-IHBT और हिमाचल प्रदेश के कृषि विभाग के बीच MoU पर हस्ताक्षर हुए।

उपयुक्त जलवायु और खेती के लिए उचित क्षेत्र

हींग का पौधा ठंडी और शुष्क जलवायु में पनपता है। यह पौधा -4°C से 40°C तापमान को सहन कर सकता है। अत्यधिक ठंड में यह निद्रावस्था (dormant) में चला जाता है। अत्यधिक नमी और वर्षा इस पौधे के लिए हानिकारक है।

पैरामीटरआवश्यकता
तापमान-4°C से 40°C (आदर्श: 5°C–15°C)
वार्षिक वर्षा300 मिमी से कम
ऊँचाई3000 मीटर से अधिक (आदर्श)
आर्द्रतान्यूनतम – शुष्क वातावरण आवश्यक
धूपपर्याप्त सूर्यप्रकाश अनिवार्य

भारत में उपयुक्त क्षेत्र

वर्तमान में भारत में निम्नलिखित क्षेत्र हींग की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माने गए हैं:

  • हिमाचल प्रदेश: लाहौल-स्पीति, किन्नौर, मड्ग्रान, बीलिंग, कीलोंग
  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख: ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र
  • उत्तराखंड: उत्तरकाशी और अन्य उच्च-तुंगता घाटियाँ
ध्यान दें: मैदानी क्षेत्रों की उच्च आर्द्रता और तापमान हींग की खेती के लिए अनुकूल नहीं हैं। CSIR-IHBT पॉलीहाउस और शेड नेट तकनीक से इसके दायरे को विस्तारित करने पर अनुसंधान कर रही है।

मिट्टी और खेत की तैयारी

हींग की खेती के लिए रेतीली दोमट (Sandy Loam) मिट्टी सबसे उपयुक्त है जिसमें जल-निकास बेहतरीन हो। जलभराव वाली भारी मिट्टी में पौधे की जड़ें सड़ जाती हैं। मिट्टी का pH मान 7.0 से 8.5 (हल्की क्षारीय) के बीच होना चाहिए।

खेत तैयार करने के चरण

  1. गहरी जुताई: रोपाई से 4–6 सप्ताह पहले 30–40 सेमी गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए।
  2. कंकड़-पत्थर हटाएँ: हींग की जड़ें मांसल और गहरी होती हैं इसलिए मिट्टी में से पत्थर और बड़े ढेले निकालें।
  3. उठी हुई क्यारियाँ: बेहतर जल-निकास के लिए उठी हुई क्यारियाँ (Raised Beds) बनाएँ।
  4. मिट्टी परीक्षण: रोपाई से पहले मिट्टी का परीक्षण कराएँ और pH अनुसार चूना या गंधक का प्रयोग करें।
  5. जैविक खाद मिलाएँ: प्रति हेक्टेयर 10–15 टन सड़ी गोबर की खाद या कंपोस्ट भूमि में मिलाएँ।

बीज, नर्सरी और रोपाई विधि

बीज की उपलब्धता

अभी तक भारत में Ferula assa-foetida के प्रमाणित बीज CSIR-IHBT, पालमपुर और हिमाचल प्रदेश के कृषि विभाग के माध्यम से ही उपलब्ध हैं। इच्छुक किसान CSIR-IHBT से सम्पर्क करके बीज और पौध प्राप्त कर सकते हैं। बीज का अंकुरण प्राकृतिक रूप से बहुत कम (5% से कम) होता है, इसलिए वैज्ञानिक विधि से seed dormancy तोड़कर नर्सरी में पौध तैयार की जाती है।

नर्सरी में पौध तैयार करना

CSIR-IHBT के वैज्ञानिकों ने seed dormancy को दूर करने की एक विशेष तकनीक विकसित की है। बीजों को ठंडे और नम वातावरण (Cold Stratification) में 30–45 दिन तक रखने के बाद नर्सरी में उगाया जाता है। नर्सरी में पौध 6–8 महीने में रोपाई के लिए तैयार होती है।

रोपाई की विधि और दूरी

विवरणमानक
पौधे से पौधे की दूरी60–75 सेमी
पंक्ति से पंक्ति की दूरी90–100 सेमी
रोपाई का उचित समयशरद ऋतु (सितंबर–अक्टूबर)
रोपाई की गहराई5–7 सेमी
प्रति हेक्टेयर पौधेलगभग 10,000–12,000
महत्वपूर्ण: रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। पाले से बचाव के लिए पौधों को मल्च (भूसा या सूखी घास) से ढकें। पहले वर्ष में पौधे धीरे-धीरे बढ़ते हैं – निराश न हों।

खाद और उर्वरक प्रबंधन

हींग एक दीर्घकालीन फसल है इसलिए शुरुआत में ही मिट्टी की उर्वरता सुनिश्चित करना जरूरी है। रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग और जैविक खाद का संयोजन सबसे अच्छा परिणाम देता है।

खाद/उर्वरकमात्रा (प्रति हेक्टेयर)देने का समय
गोबर की खाद / कंपोस्ट10–15 टनखेत तैयारी के समय
नाइट्रोजन (N)60–80 किग्रारोपाई + वार्षिक टॉप ड्रेसिंग
फॉस्फोरस (P₂O₅)40–60 किग्रारोपाई से पहले
पोटाश (K₂O)40–60 किग्रारोपाई से पहले
वर्मीकंपोस्ट3–4 टनवार्षिक (हर साल)
जिंक सल्फेट25 किग्रा2 वर्ष में एक बार
SmartKrishi की सलाह: हींग की खेती में जैविक विधि अपनाएँ क्योंकि बाजार में organic heeng की कीमत पारंपरिक हींग से अधिक मिलती है। ट्राइकोडर्मा और PSB (Phosphate Solubilizing Bacteria) जैवोर्वरक का उपयोग जड़ स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। अधिक जानकारी के लिए SmartKrishi.in देखें।

सिंचाई प्रबंधन

हींग का पौधा स्वाभाविक रूप से सूखे को सहन करने में सक्षम है और इसे अधिक पानी की जरूरत नहीं होती। जलभराव इसकी सबसे बड़ी दुश्मन है। इसलिए सिंचाई सावधानीपूर्वक करें।

  • रोपाई के बाद: पहले 15 दिनों तक हर 3–4 दिन पर हल्की सिंचाई।
  • बढ़वार अवस्था (सर्दी में): 10–15 दिन के अंतराल पर सिंचाई।
  • ग्रीष्म में: 7–10 दिन के अंतराल पर, मगर मिट्टी की नमी जाँचकर।
  • मानसून में: यदि वर्षा 300 मिमी से अधिक हो तो सिंचाई बंद करें और जल-निकास सुनिश्चित करें।

ड्रिप सिंचाई पद्धति हींग की खेती के लिए सर्वोत्तम है क्योंकि इससे पानी सीधे जड़ों तक पहुँचता है और पत्तियों व तने पर नमी नहीं रहती। Krishi Jagran और SmartKrishi.in दोनों ड्रिप सिंचाई को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।

रोग और कीट नियंत्रण

हींग अपेक्षाकृत कम रोग-प्रवण फसल है, लेकिन कुछ समस्याएँ आ सकती हैं जिनका समय पर निदान जरूरी है।

प्रमुख रोग

जड़ सड़न (Root Rot – Pythium / Fusarium)

कारण: जलभराव और अत्यधिक नमी। लक्षण: पौधा पीला पड़ने लगता है और जड़ें गल जाती हैं। नियंत्रण: जल-निकास सुधारें, ट्राइकोडर्मा विरिडी 4 ग्राम/किग्रा मिट्टी में मिलाएँ और कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर से ड्रेंचिंग करें।

पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew)

लक्षण: पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत। नियंत्रण: घुलनशील गंधक (Wettable Sulphur) 2 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव करें।

पत्ती धब्बा (Leaf Spot – Alternaria)

लक्षण: पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे। नियंत्रण: मैंकोजेब 2.5 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव करें और प्रभावित पत्तियाँ हटाएँ।

प्रमुख कीट

माहू/एफिड (Aphid)

नियंत्रण: नीम तेल 5 मिली/लीटर का छिड़काव या इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली/लीटर का उपयोग करें। पीले चिपचिपे ट्रैप भी प्रभावी हैं।

सफेदमक्खी (Whitefly)

नियंत्रण: पीले रंग के चिपचिपे ट्रैप लगाएँ और नर्सरी को 50-mesh नेट से ढकें।

जैविक कीट नियंत्रण: नीमखली (500 किग्रा/हेक्टेयर) मिट्टी में मिलाने से मृदाजनित रोग और कीट दोनों नियंत्रित होते हैं। यह जैविक खेती के लिए भी सुरक्षित है।

हींग का उत्पादन – राल निकालने की विधि और भंडारण

हींग का उत्पादन पारंपरिक टमाटर या अनाज की तरह नहीं होता। इसमें पौधे की जड़ों से ओलिओ-गम रेजिन (Oleo-gum Resin) निकाला जाता है। यह प्रक्रिया रोपाई के लगभग 5 वर्ष बाद शुरू होती है।

राल निकालने की विधि

  1. पत्तियाँ काटें: 5वें वर्ष में पौधे के फूल आने से पहले (मार्च–अप्रैल) पत्तियाँ और तना जमीन से 5–7 सेमी ऊपर से काट दें।
  2. जड़ उघाड़ें: जड़ के ऊपरी सिरे को धीरे-धीरे उघाड़ें और ऊपरी 2–3 सेमी हिस्सा सतर्कता से काटें।
  3. राल संग्रह: कटे हुए सिरे से दूधिया राल निकलती है। इस राल को एकत्रित करके बर्तन में रखें।
  4. दोबारा काटें: 8–10 दिन बाद फिर से थोड़ा काटें – यह प्रक्रिया 3–4 महीने तक दोहराई जा सकती है।
  5. सुखाएँ: एकत्रित राल को छायादार और सूखी जगह पर सुखाएँ। सूखने पर यह भूरे-पीले रंग की ठोस हींग बन जाती है।

भंडारण

सूखी हींग को वायुरोधी (airtight) पात्र में, ठंडी और सूखी जगह पर रखें। सीधी धूप और नमी से दूर रखें। उचित भंडारण में हींग 2–3 वर्ष तक खराब नहीं होती।

लागत, उपज और आय का विश्लेषण

हींग एक दीर्घकालीन निवेश है। पहले 5 वर्ष तक आय नहीं होती लेकिन एक बार उत्पादन शुरू होने के बाद यह अत्यंत लाभदायक होती है।

विवरणअनुमानित आँकड़े
स्थापना लागत (प्रति हेक्टेयर)₹1.5 लाख – ₹2.5 लाख (5 वर्ष तक)
प्रति पौधे उपज (राल)500 ग्राम – 1 किग्रा प्रति वर्ष
प्रति हेक्टेयर उपज5–12 किग्रा (कच्ची हींग)
कच्ची हींग का बाजार मूल्य₹35,000 – ₹40,000 प्रति किग्रा
अनुमानित आय (प्रति हेक्टेयर/वर्ष)₹1.75 लाख – ₹4.8 लाख
दीर्घकालीन लाभ: हींग का एक पौधा 10–12 वर्षों तक उत्पादन दे सकता है। एक बार स्थापित हो जाने के बाद वार्षिक लागत बहुत कम हो जाती है और मुनाफा लगातार बढ़ता रहता है। FPO (Farmer Producer Organisation) के माध्यम से सामूहिक विपणन से और अधिक लाभ मिलता है। सरकारी योजनाओं की जानकारी के लिए SmartKrishi.in पर जाएँ।

सरकारी सहायता कैसे प्राप्त करें?

CSIR-IHBT और हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग हींग की खेती के इच्छुक किसानों को प्रशिक्षण, पौध और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इसके अलावा Krishi Jagran Hindi और Kisan Tak जैसी कृषि वेबसाइटें भी नवीनतम सरकारी योजनाओं की जानकारी देती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्र. 1: हींग की खेती भारत में कहाँ होती है?
भारत में हींग की खेती मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर, लद्दाख और उत्तराखंड के उत्तरकाशी जैसे उच्च-तुंगता वाले ठंडे और शुष्क क्षेत्रों में होती है। CSIR-IHBT, पालमपुर ने 15 अक्टूबर 2020 को लाहौल घाटी के ग्राम क्वारिंग में भारत में पहली बार हींग का पौधा रोपकर इसकी व्यावसायिक खेती की शुरुआत की।
प्र. 2: हींग का पौधा कितने साल में तैयार होता है?
हींग का पौधा (Ferula assa-foetida) एक दीर्घकालीन फसल है। रोपाई के लगभग 5 वर्ष बाद इसकी जड़ों में ओलिओ-गम रेजिन का उत्पादन शुरू होता है। इसके बाद यह पौधा 10–12 वर्षों तक लगातार उत्पादन देता रहता है। इसलिए इसे एक दीर्घकालीन निवेश के रूप में देखना चाहिए।
प्र. 3: भारत में हींग की कीमत कितनी है और इसकी माँग क्यों इतनी अधिक है?
भारत में कच्ची हींग का बाजार मूल्य लगभग ₹35,000 से ₹40,000 प्रति किलोग्राम तक होता है। इसकी माँग इसलिए इतनी अधिक है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा हींग उपभोक्ता देश है (वैश्विक उत्पादन का 40%) और देश में इसका उत्पादन अभी नगण्य है। भारत सालाना ₹600 करोड़ की हींग आयात करता है।
प्र. 4: हींग की खेती के लिए कौन सी मिट्टी और तापमान चाहिए?
हींग की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी जिसमें उत्तम जल-निकास हो और pH 7.0 से 8.5 के बीच हो, सबसे उपयुक्त है। तापमान -4°C से 40°C के बीच होना चाहिए और वार्षिक वर्षा 300 मिमी से कम होनी चाहिए। 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले ठंडे-शुष्क पर्वतीय क्षेत्र इसके लिए सबसे आदर्श हैं।
प्र. 5: क्या मैदानी किसान हींग की खेती कर सकते हैं?
वर्तमान में मैदानी क्षेत्रों की अधिक आर्द्रता, उच्च तापमान और भारी वर्षा हींग की खेती के लिए अनुकूल नहीं है। हालाँकि CSIR-IHBT पॉलीहाउस और शेड नेट तकनीक के माध्यम से इसकी खेती का दायरा बढ़ाने पर शोध कर रहा है। मैदानी किसान अभी CSIR-IHBT से प्रशिक्षण लेकर भविष्य की योजना बना सकते हैं और उपयुक्त होने पर controlled environment में प्रयोग कर सकते हैं।

निष्कर्ष

हींग की खेती (Heeng Ki Kheti) भारत के लिए एक क्रांतिकारी कदम है। CSIR-IHBT के अथक प्रयासों से भारत अब इस बहुमूल्य मसाला फसल को अपनी भूमि पर उगाने में सक्षम हो रहा है। यह खेती न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगी बल्कि लाहौल-स्पीति जैसे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को भी बेहतर आजीविका का अवसर देगी।

यदि आप हिमाचल प्रदेश, लद्दाख या उत्तराखंड के उच्च-तुंगता क्षेत्र के किसान हैं तो CSIR-IHBT से सम्पर्क करें और प्रशिक्षण प्राप्त करें। अधिक कृषि जानकारी, सरकारी योजनाओं और स्मार्ट खेती के सुझावों के लिए SmartKrishi.in पर नियमित रूप से विजिट करें।

विस्तृत जानकारी के लिए आप Krishi Jagran – हींग की खेती, Kisan Tak और PIB – CSIR-IHBT की आधिकारिक रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं।

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